धार्मिक

सनातन संस्था का लेख दीपावली पर्व का अध्यात्मशास्त्र व उसका महत्व

      दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है! दिवाली शब्द की उत्पत्ति दीपावली शब्द से हुई है। दीपावली शब्द दीप+आवली (कतार, रेखा) से बना है । इसका अर्थ है, दीयों की एक रेखा । दीपावली पर सर्वत्र दीप जलाए जाते हैं। भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे, उस समय लोगों ने दीपोत्सव मनाया। तभी से दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है। सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख में आइए जानते हैं, दीपावली का आध्यात्मिक शास्त्र । दीपावली का त्योहार मनाते समय आज कल होने वाले अपप्रकार को भी यदि हम रोकने का प्रयास करते हैं अथवा स्वयं भी वह करना टालते हैं तो हम इस त्यौहार के माध्यम से ईश्वर का चैतन्य अधिक से अधिक अनुभव कर सकते हैं। आइए इस दीपोत्सव को शास्त्रों के अनुसार श्री लक्ष्मी, श्रीकृष्ण और यमदेव आदि देवताओं का स्मरण कर शास्त्र के अनुसार मनाकर आनंद को दोगुना करें!

दीपावली के दिनों का महत्व

      दीपावली चार दिनों तक अश्विन वद्य त्रयोदशी (धनत्रयोदशी), अश्विन वद्य चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी), अश्विन अमावस्या (लक्ष्मीपूजन) और कार्तिक शुद्ध प्रतिपदा (बलि प्रतिपदा) को मनाई जाती है। कुछ लोग त्रयोदशी को दिवाली नहीं मानते, परंतु दिवाली को शेष तीन दिन मानते हैं। वसुबारस और भाई-दूज दिवाली से जुड़े हुए हैं, इसलिए उन्हें दिवाली में सम्मिलित किया गया है; लेकिन वास्तव में वे त्यौहार अलग हैं। आइए हम दिवाली के प्रत्येक दिन के आध्यात्मिक शास्त्रीय महत्व को संक्षेप में समझते हैं।

वसुबारस और गुरुद्वादशी: आश्विन वद्य द्वादशी को वसुबारस और गुरुद्वादशी मनाई जाती है। इस दिन हमारे आंगन के गाय को वासवदत्त का स्वरूप प्राप्त होता है, अर्थात उसका नामकरण होकर उसे देवत्व प्राप्त होता है । इसलिए इस दिन को वसुबारस कहा जाता है। एक कथा है कि समुद्र मंथन से पांच कामधेनु का जन्म हुआ था। यह व्रत नंदा नाम की कामधेनु को संबोधित है। इसी तिथि को गुरुद्वादशी के अवसर पर शिष्य गुरु की पूजा करते हैं।

धनत्रयोदशी (धनतेरस): यह पर्व अश्विन वद्य त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। दिवाली से जुड़े इस त्योहार के अवसर पर नए स्वर्णालंकार खरीदने की प्रथा है। व्यापारी वर्ग भी उसी दिन अपने तिजोरी की पूजा करते हैं। व्यापारियों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है; क्योंकि श्री लक्ष्मी देवी की पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है। इस दिन साधना के लिए अनुकूलता और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए धनलक्ष्मी की पूजा की जाती है। वार्षिक आय का 1/6 भाग पूरे वर्ष उचित तरीके से धन अर्जित करके धर्म कार्य के लिए दान करना चाहिए। इस दिन यमदीपदान का विशेष महत्व है।

धन्वंतरि जयंती: धनत्रयोदशी देवताओं के उपचारक धन्वंतरि देवता का जन्मदिन है। वैद्य मंडली इस दिन धन्वंतरि (देवताओं के वैद्य) की पूजा करते हैं। लोगों को ‘प्रसाद’ के रूप में बारीक कटी हुई नीम की पत्तियां और चीनी दी जाती है।

नरक चतुर्दशी : नरकासुर राक्षस की मृत्यु के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले दिवाली के इस त्योहार के अवसर पर, सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान किया जाता है। अभ्यंगस्नान के उपरांत, अकाल मृत्यु को रोकने के लिए यम तर्पण करने के लिए कहा जाता है। तर्पण का यह अनुष्ठान पंचांग में दिया गया है। उसी के अनुसार अनुष्ठान करना चाहिए। इस दिन, ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्र भी दान किए जाते हैं और प्रदोष काल की अवधि के में दीपक जलाए जाते हैं। जिसने प्रदोष व्रत लिया है, वह प्रदोष पूजा और शिव की पूजा करता है।

लक्ष्मी पूजन : लक्ष्मी पूजन के दिन भगवान विष्णु ने लक्ष्मी सहित सभी देवताओं को बलि के कारागृह से मुक्त कर दिया और उसके बाद सभी देवता क्षीरसागर में जाकर सोए । ऐसी कथा है । इस दिन की विधि है कि सुबह मंगल स्नान कर लक्ष्मी पूजन, दोपहर में पार्वणश्राद्ध और ब्रह्म भोजन और प्रदोष काल में लता पल्लव द्वारा सजाए गए मंडप में देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु और कुबेर की पूजा की जाती है। इस दिन श्रीलक्ष्मी देवी का तत्व कार्यरत रहता है। इस तत्व से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए श्रीलक्ष्मी देवी की पूजा विधि पूर्वक करनी चाहिए।

बलिप्रतिपदा : भगवान विष्णु ने कार्तिक शुद्ध प्रतिपदा (दिवाली पड़वा), इस तिथि  का नाम बलि राजा के नाम पर किया।  इसलिए इस तिथि को ‘बलि प्रतिपदा’ कहा जाता है। यह वह दिन है जब भगवान विष्णु वामन अवतार के साथ बलि राजा को पाताल में ले गए थे। दीपावली पड़वा साढ़े तीन मूहूर्त का आधा है। यह ‘विक्रम संवत’ काल गणना के वर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं अभ्यंग स्नान करती हैं और अपने पति की आरती उतारती हैं। इस दिन गोवर्धन पूजा करते हैं। सभी जन नए कपड़े पहनकर और व्यंजन खाकर आनंद मनाते हैं।

भाई-दूज (यमद्वितीय) : कार्तिक शुद्ध द्वितीया भाई-दूज का दिन है। इस दिन यम अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे; इसलिए इसका नाम ‘यमद्वितीय’ पड़ा। कहा जाता है कि इस दिन नरक की आत्माओं को नरक में नहीं जाना पड़ता है क्योंकि मृत्यु के देवता यम इस दिन अपनी बहन के यहां भोजन करने जाते हैं।  इस दिन बहन अपने भाई की आरती उतारती है और उसकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती है। इस दिन भाई को बहन के पास जाना चाहिए और बहन को भाई की आरती उतारनी चाहिए । यदि किसी स्त्री का कोई भाई नहीं है, तो किसी भी परपुरुष को भाई मान कर आरती उतारनी चाहिए। यदि यह संभव न हो तो भाई के रूप में चंद्रमा की आरती उतारनी चाहिए।

आज कल दीवाली के समय देर रात तक तेज आवाज वाले पटाखे जलाए जाते हैं। इससे ध्वनि और वायु प्रदूषण के साथ-साथ पटाखों से जान-माल का नुकसान होता है। लक्ष्मीछाप, कृष्ण छाप, नेताजी सुभाष चंद्र बम और अन्य देवताओं और राष्ट्रीय नायकों को चित्रित करने वाले पटाखे भी चलाए जाते हैं। जब देवताओं और राष्ट्रीय नायकों के चित्रों वाले पटाखे बजाए जाते हैं, तो चित्रों के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं इससे उनका अनादर होता हैं और धर्म हानि का पाप लगता हैं। देश और धर्मकार्य के लिए पटाखों पर खर्च किए गए धन का दान करें।  दीपावली पवित्रता, मांगल्य और आनंद का त्योहार है। दीपावली के दिनों में अधिक से अधिक साधना (अर्थात् नामजप, प्रार्थना, सत्सेवा, दान आदि) करने का प्रयास करना चाहिए। इस दिन अधिक साधना करने वाले व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिलता है। सभी हिन्दू बंधुओं को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

संदर्भ: सनातन संस्था का ग्रंथ ‘त्यौहार मनाने की उचित पद्धति’

श्री. गुरुराज प्रभु
सनातन संस्था
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