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शैक्षणिक क्षेत्र की महिलाओं द्वारा राष्ट्रसेवा रुपी अध्यापन की जिम्मेदारियां, व्यवसाय नहीं अपितु व्रत है ! : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

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प्रस्तावना : युवा वर्ग भारत का आधारस्तंभ है । इस आधारस्तंभ को सुदृढ बनाने के लिए शिक्षकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है । इसका कारण केवल शैक्षणिक अभ्यासक्रम पूर्ण करना ही नहीं, अपितु ‘राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना’ भी शिक्षकों का महत्त्वपूर्ण दायित्व है । आज अध्यापन क्षेत्र में महिलाओं की मात्रा अधिक है, तब भी अध्यापन की ओर सामान्यत: ‘आराम की’, ‘अधिक छुट्टियों की एवं कम समय की’ नौकरी के रूप में देखा जाता है । इस दृष्टिकोण को बदलकर इसे एक ‘व्रत’ के तौर पर शिक्षकों को इसके प्रति अपना दायित्व निभाना चाहिए । उसी में विश्वगुरु भारत का भविष्य है ।

 

विद्यार्थियों को ‘मार्क्स’वादी नहीं, अपितु सद्गुणी बनाना : आज शिक्षा क्षेत्र की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है । विद्यार्थी ‘रैट रेस’ (चूहा दौड अर्थात तीव्र प्रतियोगिता) में जी तोड कर सहभाग ले रहे हैं । माता-पिता की अपेक्षाओं का बोझ, अन्य विद्यार्थियों के साथ स्पर्धा, आरक्षण का भूत, नीरस अभ्यासक्रम जैसी अनेक समस्याओं से आज का विद्यार्थी तनावग्रस्त हो गया है । शिक्षा लेकर भी नौकरी मिलेगी, इसकी निश्चिती नहीं और शिक्षा का दैनंदिन जीवन में कुछ उपयोग होगा, ऐसी भी स्थिति नहीं है । ऐसी परिस्थिति में विद्यार्थियों को योग्य दिशा देने में शिक्षक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । उसके लिए शिक्षकों को स्वयं सक्षम होना अत्यंत आवश्यक है । विद्यार्थियों को ‘मार्क्स’वादी नहीं, अपितु सद्गुणी बनाने की ओर शिक्षकों को ध्यान देना चाहिए । इसका कारण अच्छे ‘मार्क्स’ विद्यार्थियों को अधिक से अधिक भौतिक सुख प्राप्त करवाने में सहायक होंगे; परंतु ‘सद्गुणों’ की पूंजी उन्हें जन्म भर उपयोगी होगी । इन्हीं सद्गुणों के आधार पर विद्यार्थी भविष्य में ‘अच्छा नागरिक’ बन सकता है ।

 

बच्चे अनुकरणप्रिय होने के कारण शिक्षकों को अपने वर्तन से ही आदर्श प्रस्थापित करना आवश्यक : नैतिक मूल्यों के वर्ग में विद्यार्थियों में सद्गुण निर्माण नहीं हो सकते । विद्यार्थियों को खरे अर्थ में सद्गुणी एवं संस्कारित करना हो, तो शिक्षकों को स्वयं संस्कारी एवं सद्वर्तनी होना आवश्यक है । मान लीजिए, शिक्षकों ने वर्ग लेकर समय के अनुपालन का महत्त्व बताया; परंतु प्रत्यक्ष में शिक्षक ही वर्ग के लिए देर से आते हैं, तो उस वर्ग का परिणाम होगा क्या ? बच्चे अनुकरणप्रिय होने से शिक्षक अपने वर्तन से ही विद्यार्थियों के समक्ष आदर्श प्रस्थापित कर सकते हैं । हाल ही में कर्नाटक के बिदर जिले की सरकारी विद्यालय के एक शिक्षक का विदाई समारोह (farewell) का ‘वीडियो’ सामाजिक प्रसार माध्यमों में प्रसारित हुआ था । उस शिक्षक को विदा करते समय अन्य अध्यापक, विद्यार्थी सहित विद्यालय के कर्मचारी भी सिसकियां लेकर रो रहे थे । अपने विद्यार्थियों का प्रेम ही उस शिक्षक की कमाई है । ऐसे शिक्षक आज दुर्लभ हैं । विद्यार्थियों के आगे अपना ‘आदर्श’ रखना हो, तो शिक्षकों को भी स्वयं में गुण बढाने के लिए परिश्रम करना होगा । ऐसा करने की यदि शिक्षकों की तैयारी होगी, तो अच्छे विद्यार्थी क्यों नहीं बन पाएंगे ?

 

प्राचीन काल में भारत में गुरुकुल शिक्षाव्यवस्था प्रचलित थी । इसमें आचार्य विद्यार्थियों को सर्वांग से तैयार कर रहे थे । विद्यार्थियों के आचरण की ओर उनका ध्यान रहता था । गुरुकुल से तैयार होनेवाले प्रतिभासंपन्न विद्यार्थी राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते थे । वर्तमान में मेकॉलेप्रणित शिक्षाव्यवस्था में उसकी कमी है । विद्यार्थी झूठ बोलने वाले होंगे और किसी की नकल (कॉपी) करके परीक्षा में उत्तीर्ण हुए होंगे, तब भी आज की शिक्षा व्यवस्था केवल विद्यार्थियों का कागज पर ‘मार्क्स’ को महत्त्व देती है । यह वर्तमान की शिक्षा प्रणाली की घोर असफलता ही है, तब भी शिक्षक कम से कम अपने अध्यापन के माध्यम से अच्छे आचरण का महत्त्व विद्यार्थियों पर अंकित कर सकते हैं ।

 

राष्ट्रभक्ति का संस्कार अंकित करना : आज देश के बुद्धिमान युवक भारी भरकम वेतन के लिए विदेश में जाकर नौकरी कर रहे हैं । आज विश्व भर के अनेक आस्थापन, इसके साथ ही संस्थाओं में उच्च पदों पर भारतीय वंश के व्यक्ति कार्यरत हैं । इन लोगों ने यदि भारत के विकास में योगदान दिया होता, तो आज देश का चित्र कुछ अलग ही होता । भारत से कुशाग्र बौद्धिक क्षमता के युवक अच्छे वेतन की नौकरी के लिए परदेश में जाने के पीछे ‘राष्ट्रभक्ति की भावना का अभाव’ एक महत्त्वपूर्ण कारण है । यदि शिक्षक विद्यार्थियों पर राष्ट्रभक्ति के संस्कार करें, तो होनेवाली ‘ब्रेन ड्रेन’ रोकी जा सकती है ।

 

देशप्रेम अंकित करनेवाली कृतियां : देशसेवा करने के लिए सीमा पर जाकर ही लडना है, ऐसा नहीं । स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग, राष्ट्रप्रतीकों का सम्मान करना, देश की संस्कृति का संवर्धन करना इत्यादि देशप्रेम अंकित करने के कृत्य हैं । देश के नियम पालना, हमें दिया गया काम प्रामाणिकता से और परिपूर्ण करना, यह भी एक प्रकार से देशसेवा ही है । इस प्रकार शिक्षक यदि विद्यार्थियों पर संस्कार करें, तो भविष्य में विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त होंगे ।

 

विद्यालय-महाविद्यालयों में 15 अगस्त एवं 26 जनवरी, राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाए जाते हैं । उस निमित्त विद्यार्थियों का प्रबोधन कर, उनमें देशप्रेम अंकित करने का प्रयत्न करना, क्रांतिकारियों का चरित्र पढने के लिए विद्यार्थियों को उद्युक्त करना, उनमें त्याग की भावना निर्माण होने के लिए प्रयत्न करना, राष्ट्रपुरुषों का गौरवशाली इतिहास सिखाना इत्यादि; यदि ऐसे प्रयत्न किए जाएं, तो विद्यार्थियों में देश प्रेम का बीज बोया जा सकता है । इसके लिए शिक्षकों को स्वयं में भी असीम राष्ट्रभक्ति अंकित करनी होगी ।

 

प्रा. शिवाजीराव भोसले अपने व्याख्यानों से राष्ट्र- धर्म प्रेम अंकित करते थे । कुछ दशकों पूर्व तक गुरुजी अथवा शिक्षकों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था । आज ऐसे शिक्षकों की मात्रा अल्प है । आर्य चाणक्य-चंद्रगुप्त मौर्य, गुरु शिष्य की इस जोडी ने उस काल में समर्थ राष्ट्र की निर्मिति की । वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भी यदि शिक्षक रूपी आर्य चाणक्य निर्माण हुए, तो विद्यार्थी रूपी चंद्रगुप्त मौर्य क्यों निर्माण नहीं होेेंगे ?

 

अनुशासन नहीं, अपितु प्रेमभाव आवश्यक : विद्यार्थियों को अच्छी आदतें लगाने के लिए केवल अनुशासन किसी उपयोग का नहीं, अपितु विद्यार्थियों पर पुत्रवत् प्रेम भी करना आना चाहिए । अनुशासन से नहीं, अपितु प्रेम भाव से विद्यार्थियों को यदि अपना बना लें, तो उनमें अच्छे संस्कार डाल सकते हैं । शिक्षा क्षेत्र में कार्य करते समय हमें ध्यान रखना है कि हम निर्जीव यंत्रों को नहीं, अपितु मानवी मन को आकार दे रहे हैं । ‘इन विद्यार्थी मनों को पुष्प बनाकर उन्हें भारत माता की सेवा में अर्पण करना है’, ऐसा भाव रखकर यदि शिक्षक कार्यरत हो गए, तो देश की भावी पीढी सक्षम होगी ।

 

संकलक : श्री.चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था संपर्क : 7775858387

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