RTI आयोजन दतिया मध्य प्रदेश

आयोग की सुनवाई के बाद जानकारी न मिले तो धारा 18 की शिकायत पर हर बार लगेगा 25 हज़ार रु का जुर्माना- राहुल सिंह

आरटीआई की धारा 21 में सूचना आयुक्त के पास आधिकारिक समीक्षा मीटिंग लेने का अधिकार- अजय कुमार उप्रेती

यदि सूचना आयुक्त ईमानदारी से कार्य न करें तो पद पर बने रहने का अधिकार नहीं- शैलेश गांधी

सूचना आयोगों में खाली पद चिंता का विषय, इन्हें जल्द भरे जाना चाहिए- आत्मदीप

आयोग की सुनवाई के बाद जानकारी न मिले तो धारा 18 की शिकायत पर हर बार लगेगा 25 हज़ार रु का जुर्माना- राहुल सिंह

दतिया @RBNewsindia.com>>>>>>>>>>>>>> आरटीआई कानून को आम जनता तक पहुंचाने और कानून की बारीकियों का ज्ञान बांटने की दिशा में वेबीनार के माध्यम से चल रहे जन जागरण अभियान का सिलसिला जारी है। कोरोना काल के दौरान 28 जुलाई 2020 दिन रविवार से प्रारंभ किया गया आरटीआई वेबीनार आज अपने 98 वें पड़ाव पर पहुंच चुका है।

इस बीच दिनांक 8 मई 2022 को 98 वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय सूचना आयोग की कार्यप्रणाली और अपीलार्थियों के प्रश्न रहा। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त अजय कुमार उप्रेती, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप रहे। जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग के वर्तमान सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा एवं वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह सम्मिलित रहे।

कलेक्टर और जिले संभाग के उच्चाधिकारियों की समीक्षा बैठक लेना सूचना आयुक्त के कार्य क्षेत्र के भीतर- अजय कुमार उप्रेती

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त अजय कुमार उप्रेती ने अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में उनके द्वारा ली गई एक समीक्षा बैठक जिसमें जौनपुर जिले के कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे का जिक्र करते हुए कहा कि यह सूचना आयुक्त के कार्य क्षेत्र के अंदर की बात है और सूचना के अधिकार कानून से संबंधित जानकारी प्रदान करने के लिए और समीक्षा करने के लिए सूचना आयुक्त आरटीआई कानून की धारा 21 के तहत किसी जिले अथवा संभाग में इस प्रकार की मीटिंग और बैठक आयोजित कर सकते हैं। आरटीआई कानून की धारा 21 कहती है कि आरटीआई कानून को मजबूत करने के लिए सद्भावना पूर्वक किए गए समस्त कार्य आयोग के कार्य क्षेत्र के अंदर आते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार सूचना आयोग के द्वारा भारी भरकम फाइन लगाई जाती है लेकिन इसके बाद भी जब वह जुर्माने की राशि संबंधित दोषी लोक सूचना अधिकारियों के द्वारा नहीं भरी जाती है तो इसकी समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि ज्यादातर लोक सूचना अधिकारी आरटीआई कानून को बहुत अच्छे ढंग से नहीं समझ पाते हैं इसलिए ऐसी मीटिंग लेकर उन्हें समझाइश देना जिससे लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के स्तर पर ही आरटीआई प्रकरणों का निपटारा हो जाए और आवेदकों को राज्य सूचना आयोग में न भटकना पड़े और पेंडेंसी के कारण वर्षों इंतजार न करना पड़े इसके लिए इस प्रकार की मीटिंग और समीक्षा बैठक आयोजित करना आवश्यक हो जाता है और अधिनियम के अंतर्गत सूचना आयुक्त के अधिकार क्षेत्र के भीतर आता है।

अजय कुमार उप्रेती ने उत्तर प्रदेश और देश के अन्य प्रदेशों से जुड़े हुए आरटीआई आवेदकों उपयोगकर्ताओं के प्रश्नों के जवाब दिए।

मात्र कुछ सूचना आयुक्तों के काम करने से देश में सुधार नहीं होगा- शैलेश गांधी

वहीं पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि यदि तुलनात्मक तौर पर देश के विभिन्न सूचना आयोगों की स्थिति को देखा जाए और सूचना आयोगों में पेंडिंग पड़े हुए प्रकरणों का अवलोकन किया जाए तो यह भली-भांति समझा जा सकता है कि कुछ उंगली में गिनती करने योग्य 4 या 6 सूचना आयुक्तों के अतिरिक्त बहुतायत में कोई कार्य नहीं कर रहे हैं जिसके कारण आम जनता के लिए सूचना का अधिकार आज इतिहास का अधिकार बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि सूचना आयुक्त दो से ढाई लाख रुपए की पेमेंट पाते हैं और इतनी महंगी पोस्ट पर होते हुए भी यदि वह इमानदारी से जनता के टैक्स के पैसे का सदुपयोग करते हुए आम जनता को जानकारी मुहैया नहीं करवाते तो यह बड़े ही शर्मिंदगी की बात है।

उन्होंने आपस में चर्चा के दौरान कहा कि इस विषय पर आम जनता को भी आगे आने की आवश्यकता है और एक मुहीम चलाया जाना चाहिए। बार-बार हम शासन प्रशासन का दोष देते रहेंगे और हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे तो इसे सुधार नहीं होगा।

सूचना आयोगों में रिक्त पद भी एक बड़ी समस्या- आत्मदीप

वहीं विस्तृत चर्चा के दौरान पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने भी अपने सूचना आयुक्त के कार्यकाल के दौरान अनुभवों को साझा किया और बताया कि सूचना आयोगों की दुर्दशा यह भी है कि वहां पर्याप्त संख्या में वर्कर नही हैं जिसकी वजह से सूचना आयुक्त यदि चाहे भी तो बहुत जल्दी अपीलों का निराकरण नहीं कर पाते हैं। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में इसके विषय में काफी लिखा पढ़ी की गई थी और प्रयास किए गए थे लेकिन आउट सोर्स कर्मचारी तक की भर्ती नहीं हो पाई जिसकी वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि वह जब सूचना आयुक्त थे तो छुट्टियों में और रात भर भी कार्यालय में बैठकर काम किया करते थे। जबकि अन्य सूचना आयुक्त समय से पहले ही कार्यालय छोड़ कर चले जाते थे। उन्होंने कहा कि उनका 40 वर्ष का पत्रकारिता से भी जुड़ा हुआ अनुभव रहा है और आमजन की समस्याओं से जुड़ी बारीकियों को भी उन्होंने भली-भांति समझा और यह सही है की आम जनता को आरटीआई के लिए काफी परेशान होना पड़ता है और आम लोगों का निराकरण वर्षों बाद होने से सूचना के अधिकार कानून का मतलब ही खत्म हो जाता है।

इसलिए यह सरकार की जिम्मेदारी है की सूचना आयोग में आवश्यक संख्या में वर्कर्स उपलब्ध करवाएं और साथ में जो भी तकनीकी स्टाफ की आवश्यकता हो उन्हें भी उपलब्ध करवाएं। उन्होंने कहा की अपने कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा 80 से अधिक पब्लिक मीटिंग ली गई हैं जिसमें कलेक्टर कमिश्नर और बड़े अधिकारियों के बीच में जाकर उनको समझाइश देकर समय समय पर सूचना के अधिकार कानून को बेहतर बनाने के लिए समीक्षा बैठक की गई है। उन्होंने कहा की आरटीआई कानून को मजबूत करने के लिए सद्भावना पूर्वक किए गए प्रयास आयुक्त के कार्यक्षेत्र की बात है और इसमें किसी प्रकार के संदेह की कोई बात नहीं।

आयोग के आदेश की अवहेलना पर धारा 18 की प्रत्येक शिकायत पर पीआईओ को लगेगा जुर्माना- सूचना आयुक्त राहुल सिंह

उधर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष राहुल सिंह ने बहुत ही स्पष्ट तौर पर कहा कि लोक सूचना अधिकारियों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि आयोग के आदेश की अवहेलना काफी महंगी पड़ सकती है। यदि आयोग ने 25 हज़ार जुर्माने के साथ जानकारी देने का आदेश दिया है और पीआईओ जानकारी नहीं देता है और फिर यदि आवेदक के द्वारा पुनः धारा 18 के तहत शिकायत की जाती है उस स्थिति में पीआईओ के विरुद्ध प्रत्येक बार 25 हज़ार रु का जुर्माना लगाया जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि क्योंकि आयोग का आदेश अंतिम और बंधनकारी होता है और उसकी अवहेलना करना अर्थात मप्र सिविल सेवा आचरण अधिनियम का उल्लंघन भी है जिसके तहत आयोग स्वयं ऐसे लोक सूचना अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय और अनुशासनात्मक कार्यवाही के आदेश दे सकता है। आयोग शपथ पत्र में लोक सूचना अधिकारी से लिखवा कर ले सकता है जिसके बाद यदि गलती पाई जाती है उस स्थिति में आईपीसी की धारा 193 के तहत 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने दोनों की कार्यवाही का भी प्रावधान रहता है। सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने अभी हाल ही का एक वाकया बताया जिसमें कटनी में पदस्थ कलेक्टर को 25 हज़ार जुर्माने का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यह फर्जी नोटशीट बनाए जाने का मामला भी प्रकाश में आया है जिसकी जांच आयोग के द्वारा की जा रही है।

सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने पूरे कार्यक्रम में विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की और दर्जनों प्रतिभागियों के प्रश्नों के जवाब दिए। कार्यक्रम में देश के विभिन्न कोनों से आरटीआई कार्यकर्ता, सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग एवं मानवाधिकार और सिविल राइट्स से जुड़े हुए लोगों से लेकर आमजन तक उपस्थित रहे और अपनी अपनी जिज्ञासाओं के अनुरूप प्रश्नों का समाधान प्राप्त किया।

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