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चम्बल एक सिंह अवलोकन – भाग-56 ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर

राजा रामशाह सिंह तोमर के तीनो पुत्र और एक नाती

चम्बल की माटी का रंग ही कुछ ऐसा हे की वलिदानो को अगर कलमबद्ध किया जाए तो सम्भवतः मसि और कागद की आपूर्ति की जा सके।जब जब पूर्व से पुरवाई व्यार इस क्षेत्र में वहति हे तो बढ़ता हे चम्बल का स्तर और साथ में बढ़ता क्षेत्रवासियों की रगो में रक्तसंचार….बढ़ते रक्तसंचार की परिणीति जन्म दायक बन जाती हे कर्तव्य और धर्म के प्रति कर्तव्यता की अनुभूति के साथ-साथ प्रवल हो जाता हे कुछ करगुजरने का माद्दा ….और रच जाते हे सुभटता के इतिहास जो समय समय मातृभूमि के प्रति आहूत होने के रूप में पुनः दोहराये जाते रहे हे ….!

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आज यह गाथा हे उस तीन पीढ़ी के आत्मवलिदान की जो ग्रीष्म होते हुए जब भगवान भाष्कर के प्रचण्ड पर होते ‘रक्त तलाई’ को ‘मुगल रक्त’ से लवालव करके मानो श्रवण से पूर्ण श्रवण में परिवर्तित कर चुके थे और आज भी ‘मेवाड़धरा’ में चिरनिद्रा में लीन हे …..।

1526 ई. पानीपत के युद्ध में राजा विक्रमादित्य के वीगतिक हो जाने के समय रामशाह तंवर मात्र 10 वर्ष की आयु के थे| पानीपत युद्ध के बाद पूरा परिवार खानाबदोश हो गया और इधर उधर भटकता रहा| युवा रामशाह ने अपना पेतृक़ राज्य पाने की दशको कोशिशें की किन्तु नियति ने कुछ अलग ही नियत कर रखा था और स्वराज्य प्राप्य करने के सभी प्रयास असफल होते गए।अंततः कुछ परिवार चम्बल के सुदूर विहडो में रच बस गए तो कुछ इधर उधर छोटे-छोटे गढ़ो में स्थिर हो गए ….!

वह समय था 1558 ई. का जब नियति ने नियत को बदलना अस्वीकार कर दिया और अपने राज्य की पुनर्प्राप्ति में किया गयाअंतिम ग्वालियर पाने का आखिरी प्रयास असफल होने के बाद रामशाह चम्बल के बीहड़ छोड़ वीरों के स्वर्ग व शरणस्थली चितौड़ की ओर चल पड़े…..!

मेवाड़ की वीरप्रसूता भूमि जो उस वक्त वीरों की शरणस्थली ही नहीं तीर्थस्थली भी थी।इस भूमि पर कदम रखते ही रामशाह तोमर का मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने अतिथि परम्परा के अनुरूप स्वागत सत्कार किया। यही नहीं ….!सम्बन्धो और आत्मीयता देने के लिए महाराणा उदयसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह रामशाह तोमर के पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ कर आपसी सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता प्रदान की ।
इन्हीं सम्बन्धों के चलते रामशाह तंवर मेवाड़ में रहे और वहां मिले सम्मान के बदले मेवाड़ के लिए हरदम अपना सब कुछ बलिदान देने को तत्पर रहते थे ।

18 जून 1576 को मेवाड़ और दिल्ली के मुगल आक्रांता अकबर के मध्य घमासान युद्ध चल रहा था ….क्योंकि महाराणा ही ऐसे एक शाशक थे जिन्होंने अकेले दम पर मुगलो की युद्ध चुनोती को स्वीकार कर लिया मातृभूमि की माटी का जीते जी तिल मात्र भाग न देने की सपथ उठा राखी थी।

इन्ही के सैना का प्रमुख मारक भाग थे चम्बल सपूत महाराज रामसाह तोमर और उनके पुत्र जिन्होंने ‘हरावल दस्ते’ (अग्रिम पंक्ति योद्धा) सदा से उत्तरदायित्व सम्भाला हुआ था …..छापामार और गोरिल्ला युद्ध कलाये इनको विरासत में मिली थी लगभग ३५० रणबांकुरों की लपलपाति तलवारे निरन्तर मुगलो के रक्त को पान कर रही थी …..

बलिदान स्मारक

हल्दीघाटी उस समय दुसरा ‘कुरुक्षेत्र’ प्रतीत हो रही थी।और रक्ततलाई रक्त से उफ़न रही थी …..लोथो के ऊपर लोथ जम रहे थे कटे हुये नरमुंड रक्त के ऊपर तैर रहे थे …..!

इस युद्ध में एक वृद्ध वीर अपने तीन पुत्रों व अपने निकट वंशी बन्धु बान्धवो के साथ हरावल (अग्रिम पंक्ति) में दुश्मन के छक्के छुड़ाता नजर आ रहे थे…..। युद्ध में जिस तल्लीन भाव से यह योद्धा तलवार चलाते हुए दुश्मन के सिपाहियों के सिर कलम करता आगे बढ़ रहा था, उस समय उस बड़ी उम्र में भी उसकी वीरता, शौर्य और चेहरे पर उभरे भाव देखकर लग रहा था कि यह वृद्ध योद्धा शायद आज मेवाड़ का कोई कर्ज चुकाने को इस आराम करने वाली उम्र में भी भयंकर युद्ध कर रहा है ।

इस योद्धा को अपूर्व रण कौशल का परिचय देते हुए मुगल सेना के छक्के छुड़ाते देख अकबर के दरबारी लेखक व योद्धा बदायूंनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली….बदायूंनी ने देखा वह योद्धा दाहिनी तरफ हाथियों की लड़ाई को बायें छोड़ते हुए मुग़ल सेना के मुख्य भाग में पहुँच गया और वहां मारकाट मचा दी….!
अल बदायूंनी लिखता है-
ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान के पोते रामशाह ने हमेशा राणा की हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहते ठेको, ऐसी वीरता दिखलाई जिसका वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है….!उसके तेज हमले के कारण हरावल में वाम पार्श्व में मानसिंह के राजपूतों को भागकर दाहिने पार्श्व के सैयदों की शरण लेनी पड़ी जिससे आसफखां को भी भागना पड़ा….यदि इस समय सैयद लोग टिके नहीं रहते तो हरावल के आगे आये हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार हो जाती ..”
“मेने अपने जीवन में ऐसे योद्धा नहीं देखे जिनके लिए अपने करत्वयो के समक्ष अपनी जान सस्ती हे …”

तंवरों- (तोमर) की छतरी ग्वालियर

रक्त तलाई,मेवाड़ और राजपूताने की माटी में अन्तिम स्वास तक लड़ते हुए योद्धा और युद्ध के सर्वोच्य पद को प्राप्त करने बाली तीन पीढ़ियों के आत्मोत्सर्ग को चम्बल की कोटि कोटि नमन करती हे और उनकी समृति में आगामी दिनाक 18 जून 2019 को कुलदेवी योगेश्वरी माँ के भवन में आप सभी को एक सूत्र में बन्धने की लिए पुनः आह्वान करती हे ।
आइये पूर्वजो के वलिदान को स्मरण करे व उन्हें स्मरण करे …🙏

जय माँ योगेस्वरी भवानी

लेखक – जितेन्द्र विक्रम सिंह तोमर
ठिकाना-पालि ‘५२से’
मुरैना मप्र फोन 9584203012
Thakur.jstomar51@gmail.com

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