उत्तर प्रदेश

12 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा पर पचनद पर लगेगा आस्थावानों का मेला

संवाददाता- शांतिस्वरूप राजपूत

पचनद

कार्तिक पूर्णिमा पर 12 नवंबर को जनपद की सीमा पर स्थित विश्व प्रसिद्ध रचना स्थल पर आस्थावानों का मेला जुटेगा। मान्यता है कि यहीं पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था, इस कारण से इसे सुदर्शन तीर्थ भी कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में यहां पचनद के जल में साक्षात श्री यंत्र के दर्शन होते हैं। इसका दर्शन करने वाला कभी अकाल मृत्यु का शिकार नहीं होता है।

औरैया इटावा जालौन और भिंड जिले की सीमा पर स्थित इस तीर्थ क्षेत्र में यमुना, चंबल, सिंधु, पहुंज और कुंवारी नदियों का संगम होता है।पुराणों में पचनद क्षेत्र को सुदर्शन तीर्थ कहा गया है, जहां पचनद के जल में भगवान विष्णु ने खड़े होकर आदिशक्ति माहेश्वरी को प्रसन्न करके सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। यह भी मान्यता है कि द्वापर युग में अज्ञातवास पर रहे पांडवों ने यहां ओमकारेश्वर और महाकालेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी जो आज भी यहां एक मंदिर में स्थापित दो शिव लिंगों के रूप में पूजनीय है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त इस क्षेत्र के जानकार पंडित नर्मदा प्रसाद शास्त्री के अनुसार बाल्मीकि रामायण में रावण ने अपनी पत्नी मंदोदरी को बताया है कि पचनद क्षेत्र में तपस्या शीघ्र फलदाई है। दानव राज दनु के पुत्रों रम्य और करम्य ने ब्रह्मा जी के निर्देश पर पचनद में तपस्या की। करम्य ने पचनंद के जल में एक पैर पर खड़े होकर व रम्य ने यहीं आम की लकड़ी जलाकर उसके मध्य बैठकर तपस्या की। इंद्र ने मगर का रूप धारण कर करम्य का गहरे पानी में ले जाकर वध कर दिया। यह देख रम्य ने खुद को भाई के बद से दुखी होकर अग्नि को समर्पित करने का जतन किया तो ब्रह्मा ने प्रकट होकर उसे वरदान मांगने को कहा इस पर रम्य ने अपने भाई के लिए अकाल मृत्यु से मुक्ति का वर मांगा। ब्रह्मा ने अपने कमंडल से पचनद में जल छोड़ कर उसे तीर्थराज बना दिया। जिसके प्रभाव से आज भी कार्तिक पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में एवं सूर्यास्त के समय पचनद में डुबकी लगाने पर महामृत्युंजय श्री यंत्र के दर्शन होते हैं। यह भी कहा जाता है कि संत तुलसीदास ने आगरा में अकबर से भेंट कर जलमार्ग से लौटते समय पचनद में स्थित बाबा मुकुंद वन महाराज मंदिर में रहकर जगम्मनपुर नरेश को 1 माह तक रामचरितमानस सुनाई थी। उनके द्वारा दिया गया ब्रह्मावर्ती शंख आज भी मंदिर में सुरक्षित है जिसका श्रद्धालु दर्शन करते हैं।

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