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पालघर तिहरे हत्याकांड की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज से कराने की जरूरत- शैलेश सिंह कुशवाह

घटना मै कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं लेकिन कई सवालों का निष्पक्ष जवाब जरूरी

महाराष्ट्र के पालघर जिले के कासा गांव में पिछले 16अप्रैल की रात करीब साढ़े नौ बजे भीड़ द्वारा पुलिस की तीन टोलियों की मौजूदगी में दो साधुओं ओर उनके एक ड्राईवर की पीट पीट कर निर्मम हत्या के मामले में कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं है ओर न ही इस नजरिए से इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। लेकिन इस घटना को उठाने के पीछे मानवीय संवेदनाएं है। साथ ही कानून के ओर उसको लागू कराने के लिए जिम्मेदार मशीनरी के नाकाम होने की स्थिति को रोशन करना है। किसी भी तरह के वर्ग विभाजन से हटकर भीड़ की हत्यारी मानसिकता को रोकने के उपायों पर बहस कराना भी इस विश्लेषण का मतलब है। एक बड़ा मतलब यह भी है कि राजनीतिज्ञो को यह बताना है कि वे सत्ता हासिल करने के बाद लोगो की जान माल की रक्षा से लेकर उनके समान विकास के अवसर मुहैया करवाए। अपनी नाकामी की स्थिति में राजनीतिक कारण खोजने के बजाय नाकामी को स्वीकार कर सुधार के कदम उठाए।
पालघर तिहरे हत्याकांड को लेकर महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों के नेताओं ने जिस तरह के जवाब दिए है उसको देखते हुए यहां इस तरह का खुलासा करना जरूरी था। जहा तक महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के इस मामले को उठाने को विपक्ष की सहज भूमिका के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अगर फडणवीस सरकार होती टी क्या ऐसी घटना होने पर शिवसेना एवं कांग्रेस मुद्दे को नहीं उठाती।
बहरहाल पालघर तिहरे हत्याकांड के बाद पैदा हुए सवालों के जवाब सुप्रीम कोर्ट के किसी जज द्वारा की जाने वाली जांच से ही मिलना चाहिए। घटना का ब्योरा इस प्रकार आया है कि घटनास्थल जनजाति क्षेत्र है। इसे आदिवासी क्षेत्र भी कहा जाता है। घटना के बारे में अब तक सामने आई रिपोर्ट के अनुसार दो साधु कल्प वृक्ष गिरि ओर शैलेश गिरि गुजरात के सूरत में अपने गुरु के निधन पर अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जाना चाहते थे। वे अपने ड्राईवर नीलेश के साथ अहमदाबाद हाईवे से सूरत के लिए निकले थे लेकिन लॉक डॉउन के कारण उन्हें वहा से जाने की अनुमति नहीं मिली। गुरु के अंतिम संस्कार में शामिल होना जरूरी होने के कारण ड्राईवर ने दादरी सिलवासा का रास्ता सुझाया ओर साधु उस रास्ते से चल पड़े। जैसे ही कासा गांव पहुंचे वहां वन विभाग की टीम ने उनकी गाड़ी को रोक लिया। पूछताछ के दौरान ही आसपास से लोग आए ओर भीड़ जमा हो गई। कहा जाने लगा कि ये बच्चें चुराने वाले है। भीड़ ने वन विभाग की टीम की मौजूदगी में ही साधुओं की गाड़ी उलट दी। हालत बिगड़ती देख पुलिस थाने को सूचना दी गई। पुलिस भी पहुंची और भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास किया। जब भीड़ नियंत्रित नहीं की जा सकी तो अतिरिक्त पुलिस बल मंगाया गया। तीन गाड़ियों मै पुलिस टोली ओर पहुंची। पुलिस ने साधुओं को बचाने का प्रयास किया। लेकिन भीड़ पुलिस पर भी हावी होने लगी तो पुलिस टीम ने अपनी जान बचाने के लिए साधुओं को साफ तौर पर भीड़ के हवाले कर दिया ओर पीट पीट कत उनकी हत्या कर दी गई। इस घटनाक्रम में सवाल यह उठता है कि जब पुलिस को सूचना दी गई कि भीड़ ने साधुओं को घेर लिया है तो पुलिस करीब दो सी लोगो की भीड़ को काबू में करने के लिए जरूरी बल ओर हथियार लेकर क्यों नहीं पहुंची। अगर एक पुलिस इंस्पेक्टर के पास नाईन एम एम की पिस्तौल थी तो उसने भीड़ को काबू में करने के लिए पैरो में गोली क्यों नहीं मारी। घटनास्थल कासा थाना इलाके में आता है। थाना इलाके ओर वन विभाग की चौकी होने के वावजूद कोई भी पुलिस या वन कर्मचारी स्थानीय लोगो से परिचित क्यों नहीं था ताकि बचाव या बातचीत के लिए ऐसे किसी व्यक्ति का सहारा लिया जाता। कोई जनप्रतिनिधि भी सरकारी कर्मचारियों के संपर्क मै क्यों नहीं था। क्या कासा का यह इलाका इस तरह से जगली है कि वहा कोई सरकारी कर्मचारी कोई जनसंपर्क ही नहीं रखता।
यह भी सामने आया है कि घटनास्थल के आसपास इस तरह लोगो की पिटाई की घटनाएं पहले भी की गई लेकिन जान बची रही। एक डॉक्टर के साथ पहले भी मारपीट की गई थी। अगर इलाके मै इस तरह की घटनाएं होती ही रहती है तो वहा निकटतम पुलिस चोकी क्यों स्थापित नहीं की गई। पुलिस के रिकॉर्ड में ऐसे लोग की पहचान क्यों दर्ज नहीं है जो कि इस तरह की घटनाओं या वारदातो को अंजाम देते है। सवाल यह भी है कि रात के समय कम समय में ही दो सौ लोगो की भीड़ केसे जमा हो गई। कहा जा रहा है कि भीड़ ने बच्चा चोर समझ कर है तीनों की हत्या कर दी टी क्या कभी गांव या आसपास से बच्चे चुराए गए थे और उसका कोई पुलिस रिकॉर्ड है। अगर नहीं तो यह साजिश पर परदा डालने का बहाना है। पहले भी इसी तरह लोगो की पिटाई की घटनाएं होने के बाद भी पुलिस इलाके मै भरपूर तयारी के साथ क्यों नहीं पहुंची। अगर वह आपराधिक क्षेत्र है तो सशस्त्र बलो की स्थाई तैनाती क्यों नहीं की गई। अनेक ऐसे सवाल है जिनके जवाब सुप्रीम कोर्ट ने जज के जरिए की जाने वाली स्वतंत्र जांच से ही मिल सकते है। पहले की गई मारपीट की घटनाओं में पुलिस ने कोन से अभियुक्त ढूढ़े ओर उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। क्या हर बार बच्चा चोरी का संदेह बहाने ने बतौर इस्तेमाल किया गया।

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