ग्वालियर भिण्ड भोपाल मध्य प्रदेश

जरूरत से ज्यादा मेहनत करने के बाद भी आशाएं एवं आशा सहयोगीयों की अनदेखी क्यों

तपती दोपहरी में कार्य करती आशाएं

आज पूरे प्रदेश में हजारों आशाएं आशा सहयोगी अपने घर परिवार को छोड़कर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए समर्पित भाव से काम कर रही है स्वास्थ्य संबंधी जो भी जानकारी विभाग द्वारा मांगी जाती है उसका तुरंत निदान आशा और आशा सहयोगी यों द्वारा किया जाता है अभी पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाने में इन आशा और आशा सहयोगिनियों के द्वारा जो अथक प्रयास किए जा रहे हैं वह काफी सराहनीय हैं यह सब लोग अपनी जान जोखिम में डालकर घर घर जाकर जानकारी जुटा रहे हैं एवं स्वास्थ्य महकमे को नित नई जानकारी प्रदान करती हैं फिर भी इनको उचित मानदेय का भुगतान समय पर नहीं किया जाता है जब किया जाता है उसमें भी विभाग के लोग गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे रहते हैं एएनएम कंप्यूटर ऑपरेटर और विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उसमें भी कमीशन की अपेक्षा करते हैं ऐसे लोग अपेक्षा करते हैं जिनकी खुद की काफी मोटी तनखा मिलती है वह भी इनके छोटे से पारितोषिक पर अपेक्षा पाले रहते हैं और कुछ लोग तो जबरजस्ती करके भी मांग लेते हैं नहीं देने पर उनके मानदेय में भारी कटौती की जाती है जिससे इनके कार्य पर एवं मनोबल पर भी असर पड़ता है अभी हाल में इस महामारी के दौर में आशा एवं आशा सहयोगी बिना संसाधन के दिन प्रतिदिन भागम भाग में लगी रहती हैं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यह स्वास्थ्य महकमे द्वारा जब भी जो भी कार्य दिया जाता है उसके लिए यह लोग जी जान से जुटे रहते हैं आजकल तो टेक्नोलॉजी का जमाना है इनको अपना रिकॉर्ड प्रतिदिन एएनएम को उनके घर या पदस्थापना जगह पर देने जाना पड़ता है जितना उन्हें मानदेय नहीं मिलता उससे ज्यादा उनका किराया भाड़ा खर्च हो जाता है अतः सरकार को चाहिए कि इन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को समय पर मानदेय का भुगतान किया जाए एवं इनकी सेवाओं को देखते हुए इनके मानदेय में इजाफा करने की आवश्यकता है तभी यह लोग स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर और अच्छा कार्य कर सकते हैं जिससे स्वास्थ्य की दिशा में और बेहतर कार्य किया जा सकता है

30 रुपये प्रतिदिन पर इतना जोखिम भरा कार्य आशाओं से करवाया जा रहा है जबकि कोरोना योद्धा के रूप में कार्य कर रहे इन लोगों को न तो सुरक्षा किट दी गयी है ना ही कभी इनका स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है।बाहर से आये हुए प्रत्येक स्वस्थ व संक्रमित व्यक्तियों के सतत सम्पर्क में आने वाली प्रथम इकाई है आशा वर्कर और जब इनके द्वारा ग्राम में स्वास्थ्य प्रिक्सह्न हेतु स्वास्थ्य महकमे की टीम को बुलाया जाता है तो संक्रमण के डर से उस टीम को चाक चौबंद करके क्षेत्र में पहुँचाया जाता है क्योंकि ये बहुत ही जोखिम का कार्य है लेकिन आशा वर्कर इस जोखिम भरे कार्य को बगैर मास्क,ग्लब्स और सेनेटाइजर के साथ प्रतिदिन कर रही है।
अभी हाल ही में प्रदेश की राजधानी भोपाल में 2 आशा वर्कर कोरोना से संक्रमित पाई गई है लेकिन फिर भी सरकार और विभाग ने प्रदेश की आशाओं का कोरोना टेस्ट नही करवाया है।जब प्रदेश की सभी आशा एवम आशा सहयोगिनी वर्कर का कोरोना टेस्ट हो तो सकता है कि कई आशाएं संक्रमित पाहि जा सकती है।और यदि ओस हुआ तो न सिर्फ आशा वर्कर बल्कि उनके परिवार और क्षेत्र के लिए भी खतरनाक स्थिति बन सकती है।
सरकार ने इन्हें न सिर्फ उचित परित्साहन राशि,सुरकसह किट व स्वास्थ्य परीक्षण से ही वंचित रखा है बल्कि सम्मान से भी वंचित रखा है जिसकी वो हकदार हैं।जब भी कोरोना वॉरियर्स की बात होती है तो आशा वर्कर का नाम छोड़ दिया जाता है।

शैलेश सिंह कुशवाह वरिष्ठ पत्रकार आर बी न्यूज इंडिया

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